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GPA की व्यथा
July 23, 2017
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आजकल हर किसी का कहना होता है, ‘आइ डॉन्ट जज अदर्स।’ अब सोंचने वाली बात है कि कलियुग में गाहे-बगाहे ही जब कोई सच बोलता है, तो फ़िर इस बात का दावा करने वालों की संख्या इतनी ज़्यादा क्यों है? जवाब काफ़ी आसान है। ठीक उसी तरह जैसे हमारे देश में ‘सेकुलर’ कहलाने के लिये ‘हिंदू विरोधी’ होना ज़रूरी है, वैसे ही सामाजिक तौर पर ‘कूल’ और सम्मानित होने के लिये आपको ये बात स्वीकार करनी होगी कि आप ‘जज’ नहीं करते।

‘जज’ करने का मतलब भी इस प्रक्रिया में काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। अगर आप किसी नये व्यक्ति से मिलते हैं, तो उसके पहनावे, बोलचाल, हावभाव, व्यवहार आदि से अपने दिमाग में उस व्यक्ति की एक तस्वीर तैयार करते हैं। इससे आपको उस व्यक्ति को पहचानने में आसानी होती है। मोटे तौर पर देखा जाय तो ये भी ‘जज’ करना ही हुआ। पचास तरह के लोग हैं दुनिया में। इनमें से सिर्फ नाम से पहचान बहुत कम लोगों की बनती है। ज़्यादातर लोगों को आप उनकी किसी विशेषता के आधार पर याद रखते हैं। उनके किसी एक गुण या अवगुण को पहचान कर आप उनको भीड़ से अलग देखते हैं। दूसरे शब्दों में, आप उन्हें ‘जज’ करते हैं।

फिलॉसोफिकल बकचोदी से बाहर आयें तो तथ्य यह है कि हरेक इंसान, चाहे वो किसी भी उम्र का हो; आपके व्यवहार की समीक्षा करता है, और फ़िर आपको किसी ‘कैटेगरी’ में डाल देता है। हमारी कॉलेज वाली पीढी में यह काम तीन चीज़ों से किया जाता है। पहनावा या पर्सनैलिटी, अंग्रेज़ी बोलने की काबीलियत, और सबसे ज़्यादा विवादित –  जी.पी.ए। (GPA)

रिज़ल्ट का दिन ‘पावन’ माना जाता है कुछ लोगों के बीच। वहीं कुछ लोग इसे विश्वांत भी मानते है। इस बहुचर्चित दिन पर हर कोई अपने GPA के रूबरू होता है। मामला टेंढा तब होता है जब दूसरों को अपना रिज़ल्ट बताना हो। कई महानुभाव ऐसे होते हैं, जो अपने 8 & 9 प्वाइंटर जी.पी.ए को हैजा की तरह फैलाते हैं, बिना आमंत्रण के। इनका मुख्य उद्देश्य दूसरों को डिप्रेशन के भंवर में डाल कर अपनी ‘धाक’ जमाना होता है। ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठु’‌ का सम्मान इनके लिये सटीक बैठता है।

इन्हीं में से कुछ होते हैं जो सीढीयों पर सर थामे पाये जातें हैं। “बस 9.67 आया भाई। आय एम डूम्ड।” मतलब इनको साढे नौ आया है, और रंडी रोना लगाये बैठें हैं। ऐसे ही लोग सबसे ज़्यादा ‘जज’ करते हैं दूसरों को। फिर बात आती है पूछने की। अगर किसी का जी.पी.ए. पूछ दो, तो ऐसा लगता है कि प्रेमिका का मोबाइल नंबर माँग लिया गया हो। यही लोग दूसरों को हर हमेशा ‘ब्लेम’ करते हैं कि उन्हें जी.पी.ए. के आधार पर ‘जज’ किया जा रहा है, जबकि जी.पी.ए. आधारित जाति व्यवस्था के जनक खुद यही लोग होतें हैं।

कई सामान्य सोंच वाले भी इनके बीच पिस जाते हैं। मासूम सी भावना है, जिज्ञासा – क्यूरियोसिटी। कई लोग बस जानने की मंशा से पूछते हैं, बधाई देने के लिये। कई लोग अपनी खुद की हालत जानने के लिये भी दूसरों का पूछते हैं। लेकिन हमारे परम पूज्य ‘जज’ करने वाले लोग इन्हीं मासूमों पर इस कुकृत्य का लाँछन लगा बैठते हैं।

अब आपको ये साझा नहीं करना तो सीधा सीधा बोल दीजिये ऐसा। ‘जज’ करने वाली बात कहाँ से टपक आती है पता नहीं चलता। लेकिन क्या करें, कलियुग है। हर कुछ सही हो नहीं सकता। बस, ऊपर वाले से कामना है कि इस ‘जज’ करने के व्यापार में गये लोगों को टीवी शो में भेजा जाय और सबको सद्बुद्धि प्राप्त हो।

 

PS. जो मुट्ठी भर लोग इतनी हिँदी पढने में सफल रहें हैं, उनको कोटि कोटि धन्यवाद।

 

-Gyan Akarsh

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1 comment

  1. Bohot badhiya hai