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मित्रता दिवस
August 6, 2017
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शोले की बात है, धर्मेंद्र और हेमा को बचाने के लिये अमिताभ ने अपने आप को जानते बूझते मौत के हवाले कर दिया था। आज के ज़माने में गब्बर और ठाकुर तो रहे नहीं, तो दोस्ती को वैसे परखा भी नहीं जा सकता। परखने वाली चीज़ भी नहीं है दोस्ती, भरोसा करने वाली चीज़ है। थॉर और हल्क की अलग दोस्ती है, बाहुबली और कट्टपा की अलग।

इसका मतलब ये नहीं कि हाथ में चिलम पकड़ाने वाला और फ़ाइनल्स में पेपर दिलाने वाला भी दोस्त ही हो। ज़माना खराब है, नया है। दोस्ती अब वो नहीं रही जो थी। बस, उम्मीद कर सकते हैं, कि इस 5 अगस्त से कहीं कुछ लोगों को सद्बुद्धि मिल जाय।

आज की शाम (और आज का जाम), दोस्ती के नाम।

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By: Gyan Akarsh

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