Hot off the Press
‘कूल’ बनाम ‘कूल डूड’
May 15, 2017
0

ज़माना बदल रहा है। कलियुग अपने ऊफ़ान पर है। भूत से भविष्य की ओर भागने में हम इतने मशगूल हो चुके हैं कि वर्तमान के सच से हमारा कोई वास्ता नहीं रहा। पतन नज़दीक है।

मतलब बकचोदी को दो लाइन में इकट्ठा किया जाय तो ये बात सामने आती है कि 100 में से 99 तथाकथित “युवाओं” का दिमाग फिर गया है। अमेरिका की टट्टी को सर पर चढाए रखने का नतीज़ा सामने आने लगा है। अब एक सामान्य सी बात है, शेर पर वॉटरप्रूफ पेंट से धारियाँ बनाने से वो बाघ थोड़े ही बन जाएगा! बड़ी विकट व्यथा है।

अब परसों की बात है। शाम के समय ज़रा चाय पीनॆ का मन हुआ। निकले घूमने फ़िरने। तभी एक बस आकर रुकी सामने। गेट खुलने की देर थी की सारे लोग ऐसे नीचे भागे जैसे जियो प्राइम फ्री हो गया हो। इस भीड़ में चार “कूल डूड्स” तुरंत पहचान में आ गये। बढते अंधेरे में काला चश्मा, लेदर की जैकेट,ऒर नीच पैंट के नाम पर घुटनों तक लम्बा कुछ चीथड़ा लपेटे पहला “कूल डूड” बस के हैंडल के सहारे टारजन स्टाइल में नीचे उतरा। लैंडिंग देख कर पीछे वाले ‘एक्साइटेड’ हो गये। “सो कूल ब्रो! नाउ वॉच मी!” ऐसा बोलकर दूसरा लौंडा थोड़ा पीछे गया और टारजन के पूर्वजों के स्टाइल में “बैकफ्लिप” मार कर नीचे उतरा।

बाकी तीनों कूल डूड्स पूरे “डूडिया” गये। बीच वाली दो अंगुलियों को मोड़कर हाथ हिलाने लगे। और पता नही किसी भाषा के मंत्र “यो मैन यो ब्राह, स्वैग!” का जाप करने लगे। इतने में तीसरा ”कूल डूड”, जिसके कानों में साढ़े बत्तीस किलो का हेडफोन था; पता नहीं किस खुशी में नीचे वाले लौंडे की माँ बहन को गालियाँ देने लगा। ‘ऑसम स्टंट’ रिकॉर्ड ना करने की वजह से। शायद नीचे वाले की माँ बहन विडियो रिकॉर्डिंग का बिज़नेस चलातीं हो, पर उनको गाली देने का लॉजिक हमारे सर के ऊपर से निकला।

बस से निकलने के इंतज़ार में पीछे खड़े एक बुज़ुर्ग ने हमारे “डूड्स” को ज़ल्दी निकलने को कहा। बस, आ गयी कयामत। चौथे कूल डूड ने शाही अंदाज़ का एक सैल्यूट मारा, और अंकल जी के लिये रास्ता दे दिया। पर अपने “कूल डूड” वाले “सुहाग” (सुएग या स्वैग ऐसा कुछ बोल रहे थे वो लोग। गूगल करने के बाद एकमात्र यही मतलब बन पड़ा) को दिखाए बिना काम कैसे चलता? अंकल जी की बड़ी सी ट्रॉली का स्ट्रैप हमारे चौथे “कूल डूड” ने बस की सीट में फँसाया, और चारों लकड़बग्घों की तरह हँसते हुए, “कूल डूडिया मंत्र” –  “यो मैन यो ब्राह, सुएएएग” का जाप करते निकल पड़े।

तभी एक पाँचवा लौंडा बस से निकला, उसने उस बुज़ुर्ग का बैग नीचे रखने में मदद की। हम सोचे कि शायद अंकल जी के जान पहचान वाला कोई है। पर नीचे बैग रखने के बाद अंकल जी अलग रास्ते, हमारा लौंडा अलग रास्ते।

आपलोगों का तो पता नहीं। पर हमारे हिसाब से वो पाँचवा लौंडा ही ‘कूल’ है। बाकी चारों पाश्चात्य संस्कृति के रेडिएशन के शिकार हैं। फटी जीन्स पहनने, बैंक बैलेंस होने से, गरमी के समय लेदर जैकेट पहनने, ट्रैफिक लाइट से भी ज़्यादा चमकदार कपड़े पहनने या अमेरिकी टट्टी खाने से कोई “कूल” नहीं बनता। जो ऐसा मानते हैं, ऐसे लोग चूतिये होते हैं। और इन्ही का नाम “कूल डूड” होता है।

बीइंग कूल इज़ नॉट अबाउट व्हॉट यू वीयर ऑर वहॉट यू पुट ऑन डिस्प्ले। बीइंग ‘कूल’ इज़ ऑल अबाउट व्हॉट यू थिंक, एण्ड व्हॉट यू रियली आर ऑन द इनसाइड।

By : Gyan Akarsh

Give it your thought...