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बेचारी हिंदी
June 28, 2017
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अब तो ‘मॉडर्न’ हो गये हैं हमलोग। ‘प्रोग्रेसिव’ लाइफ़ है हमारी। इतना ज़्यादा ‘ग्रो’ कर गये हैं हमलोग, कि यहीं ‘प्रगतिशील जीवन’ लिख दें तो आधे लोग गूगल करने लग जायें। आगे पढने से पहले यह स्पष्ट रूप से समझ सें कि यह व्यंग्य केवल उन्हीं लोगों के लिये है जिनकी मातृभाषा हिन्दी है। (मातृभाषा मतलब मदरटंग)

मुद्दे पर आयें, तो सीधी सी बात है कि हिन्दी मर चुकी है। ज़्यादा साहित्य हम भी नहीं पढे; पर अाज के ज़माने में किसी से ‘रामधारी सिंह दिनकर’ के बारे में पूछ दो तो ऐसे घूरेगा जैसे आप मंगल ग्रह से आये हैं। बॉलीवुड के नये लौंडो की तो बात ही मत करिये। हिंदी सिनेमा बनाने वाले लोगों के डायलॉग भी अंग्रेज़ी में होते हैं। ‘रोमन स्क्रिप्ट’। किसी से वाद विवाद करने बैठो तो फट से जवाब आता है “हिन्दी यूज़लेस है ब्रो, इट्स वर्द शिट्।” अगर आप भी ऐसा सोंचते हैं तो ये बता दीजिये कि आपके घरों के बूढों का ‘यूज़’ क्या है।

तर्क गलत नहीं रहता इनका। आज हर कोई इंसान में अंग्रेज़ी ही खोजता है। कहीं जॉब में, कॉलेजों में, हर जगह अंग्रेजी की ही पूछ है आज कल। पर हिन्दी बस एक भाषा मात्र नहीं है। अगर आप हिन्दीभाषी हैं, खुद को हिन्दुस्तानी समझते हैं, तो यह आपके इतिहास का एक अटूट हिस्सा है। पेड़ के मोटे होने से मजबूती नहीं बढती। मजबूती बढती है जड़ों के गहरे होने से।

लेकिन आज कल के लौंडों को ये ‘फिलॉसॉफ़िकल शिट्’ समझ नही आता। उनको तो बस ‘कूल’ बनना होता है। और हिन्दी जैसी प्राचीन भाषा को भूल जाना ही इन्हें कूल बनने का ज़रिया दिखता है। क्योंकि ‘एंशिएंट इज़ बोरिंग। न्यू इज़ कूल’। अब इनपर ‘कटाक्ष’ करने का फ़ायदा भी नहीं होता, क्योंकि इन्हें ‘कटाक्ष’ का मतलब भी नहीं पता।

जैसी युवा पीढी हमारी है, वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी का जनाज़ा निकलेगा। और हिन्दी की चिता का ‘बॉनफ़ायर’ बना कर हमारे कूल डूड भांगड़ा करेंगे।

ऊपर वाला सबको सद्बुद्धि दे।

– By Gyan Akarsh

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