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गणतंत्र का सत्य
January 26, 2018
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‘गणतंत्र’ – रिपब्लिक। मतलब एक ऐसी सत्ता जिसे जनता बनाती है, जनता चलाती है। कहने को हमारा राष्ट्र भी ‘गणतंत्र’ हैं। हँसी आती है सुनकर। ऐसी शासन व्यवस्था जो आम जनता के कंधों पर टिकी हो, उसका ऐसा हश्र होना काफ़ी दुःखद है।

हम अधिकारों की ‘बातें’ करते हैं। हम सही और गलत की ‘बातें’ करते हैं। दूसरों की खामियाँ निकालते हैं। एक दूसरे पर अपने विचार थोपते हैं। ‘गणतंत्र’ की गुणवत्ता गणतंत्र के लोगों पर निर्भर करती है। और हमारे इस ‘गणतंत्र’ की जनता को बस स्वार्थ ही दिखता है। पैसा और ‘पावर’ ही हमारी जनता के चुने हुए प्रत्याशियों का लक्ष्य है।

कड़वा है पर सच है। ‘भारतीय गणतंत्र’ अपनी उस छवि से कोसों दूर है जिसकी कल्पना हमारे स्थापकों ने की थी। उस आदर्श गणतंत्र, आदर्श संविधान का प्रतीक, हमारा ‘गणतंत्र दिवस’ बस एक छलावा रह गया है। यही ‘सत्य’ है।

 

ज्ञान आकर्ष

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