कूल डूड्स, सोशल मीडिया, और फर्जी देशभक्ति
June 11, 2017
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पहला सवाल, ‘“देश” क्या है?’ दूसरा सवाल, ‘“देशभक्ति” क्या है?’ आजकल किसी कूल डूड से ये पूछ लिया जाय तो पहले दो सेकेंड बन्दा जम जाएगा। ‘देश’ और ‘देशभक्ति’ का मतलब समझने के लिये अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाएगा। अंततः जब उसे ‘कन्ट्री’ और ‘पैट्रियटिज़्म’ के रूप में मतलब समझ आएगा तब वह आपको ऐसे देखेगा जैसे आप गटर साफ करके मैनहोल से बाहर आए हों। ‘व्हॉट द फ़क ब्राह? सीधे सीधे नहीं पूछ सकते? एण्ड ऐसे रबिश क्वेश्चन्स कौन करता है?  नहीं पता तो गूगल कर ले ना!’

ऐसा जवाब मेरे मुँह पर भी थोपा गया था। आप कोशिश कर लें। आपके साथ भी यही होगा। आज हम ऐसे लोगों के बीच रह रहे हैं जिनकी मातृभाषा हिन्दी होने के बावजूद ‘सहानुभूति’ और ‘प्रचंड’ जैसे शब्द सुनकर उन्हें गूगल की मदद लेनी पड़ती है। इनके फ़ेसबुक टाइमलाइन पर देखो तो ‘माय कन्ट्री’, तिरंगे के स्टिकर्स, और देशभक्ति को दिखाते हुए कई पोस्ट मिल जाएँगे। भारत-पाक संबंधों पर आधारित कई पोस्ट पाकिस्तान के खिलाफ इनकी बकचोदी से पूर्ण कमेंट्स से भरे मिलेंगे। भले ही इन्हें देश की हालत का कोई अंदाज़ा ना हो, पर ये हमेशा पाक पर हमले के ‘सुविचार’ और देशभक्ति के नारे ठोकेंगे। बस, इनका उद्देश्य यही होता है कि इनके ‘सोशल सर्किल’ में इनकी ‘इमेज’ एक ‘देशभक्त’ की बनी रहे।

गलती इनकी भी नहीं है। अखबार और न्यूज़ चैनल्स से इनका कोई वास्ता रहता नहीं है। इनकी खबर का एकमात्र स्त्रोत इनकी सोशल मीडिया टाईम लाइन रहती है। जो अधपका कचरा विभिन्न पेज विस्त्रित करते हैं, उसी कचरे को यह अपने सामाजिक ज्ञान का ‘आधार’ बना लेते हैं। इन्हें पता भी नहीं होता कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की क्या स्थिति है। देश की आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियों से यह बेखबर रहते हैं। इनकी तथाकथित ‘देशभक्ति’ फेसबुक के ‘ट्राई कलर फिल्टर’ लगाने तक ही सीमित रह जाती है।

अपने चारों ओर देख लें, ऐसे ‘कूल डूड्स’ हर तरफ मिल जाएँगे। इनकी तादाद के सामने इनकी इस ‘फर्जी देशभक्ति’ का चिट्ठा खोलना खतरे से खाली नहीं है। कलियुग आ चुका है। और यह ‘कूल डूड्स’ कुछ और नहीं, कलियुग के पहले सिपाही हैं। वह दिन दूर नहीं जब एक महान सभ्यता का पतन इन्हीं कूल डूड्स के हाथों होगा। बस, हाथ पर हाथ धरे बैठिये और मानवता के अंत का आनंद उठाइये।

 

-Gyan Akarsh

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